ये एक आदत सी हो गयी है हमें किसी भी बात के लिए दुसरे को दोषी ठहराना | किसी भी बात पर हम बोलते है जो हो रहा है होने दो |जबकि उनको अछि तरह से मालूम होता है की जो भरष्टाचार हो रहा है --वह किसी न किसी तरह से उन्हें दुस्ग्प्रभावित करेगा ही |
हमेशा हम बोलते है : मै क्या कर सकता हूँ ,,मै क्या कर सकता हूँ | मै पूछता हूँ ये मै मै मिलकर ही तो "हम" बनता है ; इसी तरह ही बोलते रहे तो एक दिन सच मे ही हम कुछ करने लायक नहीं रह पाएंगे|और इस तरह देश को दुर्गति की और ले जाने के लिए हम ही जिम्मेवार होंगे |
हमेशा हम बोलते है : मै क्या कर सकता हूँ ,,मै क्या कर सकता हूँ | मै पूछता हूँ ये मै मै मिलकर ही तो "हम" बनता है ; इसी तरह ही बोलते रहे तो एक दिन सच मे ही हम कुछ करने लायक नहीं रह पाएंगे|और इस तरह देश को दुर्गति की और ले जाने के लिए हम ही जिम्मेवार होंगे |
