मुझे समझ मे नहीं आ रहा है की मै कहा से शुरु करूँ ; पर शुरुआत तो करनी ही होगी मुझे | दो सालों तक हिंदी न लिखने की वजह से मेरी हिंदी-वर्तनी सम्बन्धी गलतियाँ तो होंगी ही पर भावनाएं और सोच मे तो कोई परिवर्तन नहीं हो सकता |
मै सोचता हूँ आज की जिंदगी कैसे हो गयी है , लोग अपने आप मे ही सिमटे जा रहे हैं;उन्हें किसी की परवाह नहीं ;भगवान् सोचने और विचार करने की शक्ति सिर्फ इंसान को ही दिए है, ऐसा क्यों ;पर हम उसका इस्तेमाल ही न करें तो कैसा लगेगा .......
जैसा आज मेरा मन अचानक बेचैन हो उठा जब मैंने अपने देश के वर्तमान और अतीत का झांकना शुरू किया | मै एकाएक से स्तब्ध रह गया की लोग अपने आप मे कितना खो गए है की उन्हें अपने आप की भी सुध नहीं रह गयी है |अब मैंने सोचना शुरू किया की हम बात कितनी बड़ी-बड़ी करते है , हमें अपने आप पर फक्र होता है सोचकर की हम ऐसे देश के नागरिक है वैसे अतीत वाले देश के नागरिक हैं| पर क्या हमने कभी सोचा है देश मे आज क्या हो रहा है ???????
आज अपने ही देश मे लोग अपने घर से जबरन बेघर कर दिए जाते हैं ,और अपने ही देश मे भगोड़े (refugee) की जिंदगी जी रहे है -- और कहते है हम सबसे बड़े लोकतंत्र मे जी रहे है | उदहारण सामने है ----कश्मीरी हिन्दू |इन सबका हस्र !!वे बेचारे अपने ही घर से बेघर कर दिए गए जहाँ वे हजारों सालों से रहते आ रहे थे |हमारी सरकार तब क्या कर रही थी |उस समय मानवाधिकार क्या कर रहा था |
आखिर इस देश मे हो क्या रहा है |जिन बातों को एक छोटा बच्चा भी बिना तर्क दिए समझ सकता है ,उन बातों के लिए हमारे बुज़ुर्ग और जिम्मेवार लोग हमारे देश की सर्योच्य पंचायत संसद-भवन मे महीनो तक बहस करते है | {इनकी हरकते देख के तो लगता है जैसे इनका बचपना वापस आ गया है |बुज़र्गो को भी संसद मे मार-पिट और झगडा करते देख लगता है जैसे ये सठियाँ गए हों,वो बोलते नहीं है "बूढ़े और बचों की मानसिकता बाद मे एक जैसे हो जाती है" |मेरी एक बात समझ मे नहीं आती है अवकाशप्राप्त की उम्र मे जबकि सभी विभागों मे काम करना मना होता है तब ये देश की सर्वोच्य जगहों पर ये महानुभाव क्या कर रहे होते है (जहाँ देश के भविष्य के बारे मे फैसला लेना कोई बचों का खेल नहीं होता है) ??}अदालत कमीशन पर कमीशन बैठाता है और हमलोग चटकारे ले-ले कर इन्ही सब बातों को लेकर न्यूज़ पढ़ा और देखा करते हैं |
स्लम पर एक फिल्म बन जाती है ;जो भारत की सिर्फ गरीबी और बेबशी दिखाती है तो उसे नोबेल अवार्ड मिल जाता है(वाटर मूवी फी पहुँच ही चुकी थी फ़ाइनल मे ) |अरुंधती रॉय अपने निजी जीवन के कुछ अश्लील प्रसंगों का विवरण अपने नोवेल मे कर देती है तो उन्हें मैग्ससे अवार्ड मिल जाता है |ये अवार्ड देने वालों को हमारा ताजमहल नहीं दीखता क्या ?क्या उन्हें सिर्फ हमारा स्लम दीखता है ?की उनकी मानसिकता ही कुछ ऐसे है की उन्हें सिर्फ हमारी बुराइया ही पसंद है |उन्हें सिर्फ हमारी अश्लीलता और जंगलीपन दीखता है हमारे जीवन जीने के सिधांत और वेद ग्रन्थ नहीं दीखते हैं|
एक बात सबको पता है की जो इतिहास और अपना अतीत हम जिन किताबों मे पढ़ते है ,वह सब गलत है |इसके बावजूद भी हम 70 सालों से उन्हें पढ़े ही जा रहे है |क्या हम आज भी विवश है या गुलाम है या जो 500 सालों तक हम जो गुलाम थे उसका प्रभाव है |सब जानते है जिन अंग्रेजों ने हमारा इतिहाश लिखा ,वही हम आज भी पढ़ रहे है |जबकि इन अंग्रेजों की मानसिकता क्या थी हमारे प्रति सबको पता है|{ जो आजतक नहीं बदली है यदा-कदा आस्कर और मग्सेसे अवार्ड देने के क्रम मे दिख ही जाती है |}---हमें वे जंगली और हमारी सभ्यता संस्कृति को असभ्य समझते थे |इस मानसिकता के होने के बवजूद क्या कही से लगता है की जब सिन्धु-हड़प्पा संस्कृति की खुदाई हुई होगी और इन अवशेसों से हमारी ऊँच सभ्यता - संस्कृति की झलक जब झलक इन्हे दिखाई दी होगी ,तब क्या इसे वे लोग कुबूल कर सकते थे ?नहीं कभी नहीं और उन्होंने अपने अनुशार हमारे इतिहाश को लिखा |वे कभी नहीं कुबूल कर सकते थे की हमारी सभ्यता -संस्कृति इतनी ऊँच और हमारा जीवन -स्तर इतना महान हो सकता है |{उनकी तो इसाइयत ही खतरे मे पड़ जाती न| }उसके बाद हमारे साहित्यों और इतिहाश पर वामपंथी (communist-lobby) हावी हो गयी|इन्होने तो हद ही कर दी --- वे लोग बोलने लगे की हम आर्य ही विदेशी है बाहर से आये है, इरान से आये है, अरब से आये हैं ,मध्य एशिया से है {इनके लिए तो एक ही उदहारण काफी है मेरा आपने देखा होगा हमरे संस्कृति मे किसी भी शुभ काम मे नारियल फोड़ी जाती है --कहीं भी पुरे भारत मे कश्मीर से तमिलनाडु तक और पाकिस्तान से वर्मा तक ,,जब हम रेगिस्तान के है तो हमारे धर्म-ग्रंथों मे नारियल kahan से आ गया जी ,ये तो समुद्र के किनारे होता है,ये विचार मेरे दिमाग मे बस से ecr पर चलते हुए आया |}जैसे लगता है ये लोग ब्रिटेन की औलाद हों |येह धर्मनिरपेक्षता(secularism का definition ही दुनिया से हट के है येहाँ ) का मतलब सिर्फ बहुसंख्यक(majority of people) हिन्दुओं को तंग करना और इनकी संस्कृति का अपमान करना होता है | धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियाँ (secularism based parties of india )तो एक हाथ आगे ही हमेसा रहती है यहाँ इन सब बातों के मामले मे |भारत ही एक अपवाद(exception) है इन सब घटनाओ के मामले मे;पूरी दुनिया मे जिसकी संख्या ज्यादी होती है उसीका सिक्का जमता है (लोकतंत्र का मतलब ही होता है रुखी सुखी भाषा मे अधिक मत वालों की सरकार )|पर यहाँ तो गंगा कुछ उलटी ही बहती है |हम ही इन सबके जिम्मेवार है क्योंकि हमसे ही तो सरकार है |बहुत हो गया सहनशीलता का दिखावा और पाखंड |हम और ज्यादा सहन नहीं कर सकते |हमें अपने अतीत को याद करना होगा |हम जब तक परमाणु संपन्न नहीं हुए हमें संयुक्त-रास्त्रासंघ मे सम्मानजनक स्थान नहीं मिला | यह एक सबक है "शांत रहो पर अशांत करने वालों को शबक सिखाने के लिए हमेशा तैयार रहो ,हमेशा अपनी सुरक्षा के लिया तत्पर रहो |"
हमें सतयुग नहीं चाहिए और न ही रामयुग चाहिए |हम तो बस चाहते है इसे युग मे इसी लोकतंत्र मे शांति से रहते हुए अपने आपको विकाश्नोमुखी बनाये |हमें चन्द्रगुप्त मोर्य के शासनकाल से प्रेरणा लेनी होगी |जिसका शासन गांधार
(आफ्गानिस्तान )से कामरूप(असोम) तक था |विस्वविजेता सिकंदर को भी जिससे संधि करनी पड़ी |
आखिर हमें हो क्या गया है ,आखिर हम नपुंसक की तरह क्यों बैठे हैं? -......आप कह सकते हैं एक आदमी के कहने और करने से क्या होने वाला है --तो मै पूछता हूँ ;यदि सभी लोग इसी तरह और ऐसा ही सोचने लगे तो सच मे इस देश का कुछ नहीं हो सकता |..........SRT
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