वर्तमान परिदृश्य में ये देखने में आता है कि एक मानसिक रूप से विक्षिप्त के मतदान का उतना अधिक ही महत्व होता है जितना कि एक जिलाधिकारी का | क्या ये कहीं से प्रासंगिक है और क्या ये प्रायोगिक तौर पर सही है ?
अब प्रश्न उठता है कि तब लोकतंत्र का विकल्प क्या हो सकता है | ये यक्ष प्रश्न है पर इसका जवाब हमें ही ढूंढना होगा | देखने में प्रतीत होता है कि वर्तमान लोकतान्त्रिक व्यवस्था से अच्छी कोई भी व्यवस्था नहीं हो सकती और इसका विकल्प कुछ भी नहीं हो सकता | तो आपको पता होना चाहिए कि सुकरात और प्लेटो कि लोकतंत्र कि अवधारणा से पहले लोग राजतंत्र के बारे में यही खयालात रखते थें | लोग राजतंत्र का विकल्प और इससे अच्छा शासन के तंत्र के बारे में उस वक्त सोच भी नहीं सकते थे | पर बाद मे क्या हुआ सबको पता है |
पुराने शासन तंत्रों से तो बहुत अच्छा है वर्तमान-लोकतंत्र | राजतंत्र निरंकुश था , और जनता के हकों का दुश्मन था | साम्यवाद आज के सन्दर्भ मे शासन-तंत्र के रूप मे असफल प्रयोग है, और दुनिया मे जहाँ इसकी उत्पति हुई , वहीँ से समाप्त हो गया | सैन्य-शासन मानवाधिकार के सन्दर्भ मे कहीं से प्रासंगिक नहीं है , म्यांमार के सैन्य-शासन का उदहारण सामने है |
हमें इसी लोकतंत्र मे रहते हुए और शासन के नविन-तंत्र को आधार बनाकर एक नई शासन-तंत्र कि संकल्पना करनी होगी | जिसमे वर्तमान लोकतंत्र कि सारी खामियों का ध्यान रखा गया हो ||
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नयी शासन-तंत्र के सन्दर्भ मे मेरे विचार :-
मतदान क्रेडिट सिस्टम पर हो ; ये निर्धारित कर दिया जाये कि कितने पढ़े-लिखे के मतदान का कितना क्रेडिट होगा , और निरक्षर का कितना होगा | ओहदे के हिसाब से प्रशासनिक,सैन्य और सरकारी अधिकारीयों गैर सरकारी कर्मचारियों का कितना क्रेडिट होगा मतदान का |
प्रतिनिधि के चुनाव-पत्र नामंकान भरने कि कुछ शैक्षिक योग्यताएं और कुछ शर्तें होनी चाहिए |
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