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Saturday, January 8, 2011

मुझे ईमानदार नहीं बनना...............

मै यूँ ही सोचने लगा ................,मेरे दो दोस्त  आपस मे बात-चित कर रहे थे -"हम तभी तक इमानदार है ;जबतक हमें मौका नहीं मिलता |"सन्देश साफ़ था ,मौका मिले तो ये ९५% जो ईमानदार है ,वे भी  बेईमानी करने से बाज नहीं आएंगे |हम तो  ईमानदारी का  सिर्फ दिखावा करते है| क्योंकि हमें बेईमानी का सुअवसर ही नहीं प्राप्त हुआ | 
अधिकारी और दबंग शख्स
मुझे ईमानदार नहीं बनना ...२ तभी मेरे एक दोस्त ने  पूरी पंक्ति यह कहकर पूरी कर दी "....क्योंकि मुझे फोटो नहीं बनना |"---इशारा साफ़ था ज्यादा ईमानदार बनने का प्रयास किये नहीं की ऊपर चले  गए |हाँ तो मै कह रहा था की आखिर मै ये क्यों गुनगुना रहा था मुझे ईमानदार नहीं बनान .....मुझे  ईमानदार नहीं बनना , क्योंकि एक तस्वीर मेरे आँखों से होकर  दिमाग के तंतुओ मे उभर रही थी | मान लीजिये एक ईमानदार  और कर्त्वनिस्ठ जिलाधिकारी एक नए शहर मे आया  |तुरंत वहां के दलाल और माफिया उसके इर्द-गिर्द मंडराते नज़र आ जाते है | अब यदि उस शहर का नामी-गिरामी शख्स जो पेशे से   बिल्डर है रियल स्टेट का (वास्तव मे भू-माफिया है) आये और बोले -" सर ये पेसे के तौर पर ये३५ लाख सूटकेस  मे रखा है रख लीजिये और इस फाइल मे हस्ताक्षर कर दीजिए |अब आप बताइए ऐसे स्थिति मे  वह सरकारी कर्मचारी क्या करे ! उसके पास केवल दो विकल्प बचते है|पहला वह अवैध और गैरकानूनी ढंग  से बनायीं जा रही प्रोजेक्ट को पास कर दे और आराम से पैसा रख ले| और दूसरा वह अपनी ईमानदारी का परिचय देते हुए प्रोजेक्ट को पास करने से इंकार कर दे |इसका परिणाम उसको पता है-अगले दिन वह गोली का शिकार हो जायेगा  और फोटो बन जायेगा |इस विकल्प मे उसे पैसा (घूश) भी नहीं मिलता और गैरकानूनी तरीके से मृत्यु भी प्राप्त हो जाती है  |
अब आप ही  बताइए  वास्तव मे लोग इन दो विकल्पों मे से क्या चुनना पसंद करते है | आसान है अंदाज़ा लगाना ;पर जानते है इससे भी आसान  है,ये बोल देनाकी पूरा तंत्र (system) मे ही दोष है ,जो  एक ईमानदार को भी आखिर मे बेईमान बना देता है |
दूसरा उदहारण है यदि किसी तंत्र मे निचला अधिकारी अपने से ऊँचे के कुर्सी  के पदाधिकारी को चढ़ावा नहीं चढ़ाता क्योंकि वह ईमानदार  है तो उसके साथ क्या होता  है; पता है उसको कही  सुदूर जंगल-पहाड़ मे तबादला  कर दिया जाता है |येहा  ऊपर के अधिकारी की मानसिकता साफ़ झलकती है -"वह सोचता है की निचला अधिकारी सारा का सारा माल अकेले हड़प लेना  चाहता है "|अंततोगत्वा वह इमानदार कर्मचारी भी अवसादग्रस्त होकर घुस लेना आरम्भ कर देता  है | ये घटनाएँ पुलिस ,बैंक और विकाश प्राधिकरण मे  आसानी से देखने को मिल जाएँगी |             
हम यानी आम जनता भी कम दोषी नहीं है |हम जल्दबाजी के चक्कर मे घूश देना पसंद करते हैं| और घुस के लिए  तंत्र पर प्रत्यारोपण  कर अपने जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ लेते  हैं |जबकि हमको पता है १९६५ मे जो भ्रस्टाचार -निरोधी  कानून बना था | उसमे साफ़-साफ दर्ज है"घूसलेना और देना दोनों अपराध है "|
आप सोच रहे होंगे  की तब हम तंत्र को कैसे ठीक कर सकते हैं |मेरा तो भाई एक फंडा है ---"यदि तुम्हारे घर मे बरसात का पानी आने लगे तो तुम उस समय  क्या करोगे;अब बादल या उस माकन को बनाने वाले मजदूर-मिस्त्रियों को तो कोसना शुरू नहीं कर दोगे | यदि ऐसा करते हो तो तुम घर मे ही डूब जाओगे और  परेशानी  खुद  झेलोगे | यदि तुम उस परेशानी से बचना चाहते होगे तो तुम उस सुराख़ को बंद करने का प्रयास करोगे जहाँ से बरसात का पानी आ रहा होगा और जिससे घर मे पानी आना बंद हो जाये " | ठीक इसी तरह यदि हमारे तंत्र ,समाज,संस्कृति धर्म मे यदि कोई कमी(सुराख़)  है तो हमें उसे बंद करके,मरम्मत करके  ठीक करना हमारा फ़र्ज़ बनता है |
उफ्फ-हो  ये मै क्या करने लगा ,ये तो मै उपदेश देने लगा जबकि जानता हूँ  |उपदेश देना कितना आसन है  और प्रयोग मे लाना  कितना कठिन |भारत मे उपदेश देने वालों की कमी नहीं है सो मुझे उपदेश देने मे बेरोजगार रहना ही पसंद है |
तो मै बोल रहा था अब इसका हल समाज के पास  क्या है |मेरा तो अपने जीवन का एक फंडा है --"मुझे ईमानदार नहीं बनना; लेकिन बेईमानो मे से कुछ ईमानदार बनना है |"मतलब साफ़ है यदि आपको सच मे ईमानदारी से कार्य करना है तो एक काम काम करना होगा |अब मै वही दो विकल्पों पर गौर करता हूँ ---एक तरफ पैसा,जिंदगी और आराम है और दूसरी तरफ ईमानदारी के साथ मौत |तो मै येहाँ  क्या तीसरे विकल्प की कल्पना कर सकता हूँ!इस विकल्प मे पैसा भी मिल जायेगा ,उसे पैसे से उस माफिया को साफ़ करने का रास्ता भी मिल जायेगा  और कुछ गरीबों मे  बांटकर धर्म और ईमानदारी का कार्य भी हो जायेगा |
इस कार्य के करने के दो वजह --१.अपनी जिंदगी सही सलामत रही  तभी तो कोई भी ईमानदारी का काम करने लायक रह पाएंगे |२. "आत्मेन रक्ष्यते  परमोधर्मः || " तो पैसा लेकर अपनी जिंदगी बचाओ |३.उस माफिया को ख़त्म करके एक कर्तव्य भी पूरा करो |(शाठ्यम सदा दुर्जनः|| )|और पैसा गरीबों मे बांटकर  एक नेकी और धर्म का कार्य भी कर दो |
इसीलिए तो मै कहता हूँ --हमें ईमानदार  नहीं (बनना ) चाहियें -------------------------------------------------बल्कि बेईमानों मे से थोरा ईमानदार चाहियें ||

1 comment:

  1. कुछ दोस्तों ने आपत्ति दर्ज किया की मैंने भगवान् परसुराम का फोटो को अपने पोस्ट मेंक्यों लगाया हूँ |तो मै आप सबको बता दूँ ;मेरे भगवान् परसुराम का फोटो लागाने से कोई संकीर्ण मानसिकता नहीं जुडी हुई थी |मै तो ये दर्शाना चाहता था की कभी-कभी अपने और समाज के हित के लिए हथियार उठाना पड़ता है,जबकि हथियार उठाना आपका पेशा नहीं होता है|कभी-कभी अपने रोज़गार से इतर समाज सुधर हेतु अपने काम को एक अलग दिशा देने की जरूरत पड़ जाती है |परशुराम परिचायक है एक ज्ञानी के साथ वोजस्वी और तेजस्वी का ,जिनोहेने तंत्र में फैले भ्रस्टाचार को ख़त्म करने के लिए हथियार उठाया |जैसे को तैसा (tit for tat ) शाठ्यम सदा दुर्जनः ||अर्थात दुष्ट के साथ सदैव दुष्टता पूर्वक व्यववहार करना चाहिए |

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