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Tuesday, January 11, 2011

उपदेश के बहाने

आज जहाँ देखो वहां उपदेश देते लोग नज़र आ जायेंगे  |  बाप-बेटे को,पति पत्नी को,  शिक्षक शिष्य को ,नेता कार्यकर्ता को, सिनिअर  जूनियर को , ये बड़े गर्व से उपदेश दे रहे होते हैं, जैसे  उपदेश देना इनका कर्तव्य हो  |  मुझे तो लगता है ज्यादातर उपदेश देनेवालों का उपदेश देने के पीछे  एक खाश मकसद और स्वार्थ छीपा हुआ रहता है |  इनकी मानसिकता(मकसद) होता है सामने वाले को उपदेश के बहाने निचा दिखाना  और अवसाद ग्रस्त करना |  ऊपर का कर्मचारी निचे के कर्मचारी को, सिनिअर जूनियर को , प्रोफ़ेसर शोध छात्र को निचा दिखाते रहते हैं ,  ये महानुभाव-लोग (इन्हें )  उपदेश देने  के बहाने अवसादग्रस्त(frustrate )  कैसे करें यही सोचते रहते हैं |  ये उपदेश देते वक़्त एक पल के लिए भी नहीं सोचते की यदि वे खुद दिए गए उपदेश पर अमल करते तो ये उपदेश देने की नौबत ही न आती |  किसी अच्छे  कार्य को कर के उदहारण पेश करने के बजाय ये अपनी गलतिओं को छुपाकर , उपदेश के बहाने अपनी झल्लाहट सामने वाले  को अवसादग्रस्त कर के निकालते हैं |  खुद तो जिंदगी मे अवसादग्रस्त रहते ही हैं ,  सामने वाले को भी उपदेश के बहाने  अवसादग्रस्त करते हैं |        

साधू-महात्मा,मौलवी साहब  सब जनता को फ़ोकट मे उपदेश दे रहे होते हैं | जनता को जरूरत भले न हो ; पर फिर भी वे उपदेश देंगे  क्योंकि इससे ही तो इनका रोज़गार चलता है |  यह बात तो समझ मे आती है, पर ये  समझ मे नहीं  आता की आज सारा देश ही उपदेश के चक्कर मे कैसे   पड़ गया है | जहाँ देखो वहीँ लोग एक दुसरे को फ़ोकट मे उपदेश देते नज़र आ जाएँगे |  क्या इन्हे पता नहीं होता --"उपदेश देना जितना आसान होता है; प्रयोग मे लाना उतना ही कठिन होता है | "
आज उपदेश देना  हमारी संस्कृति और देश मे इस कदर समां गया है की जैसे लगता है हम  उपदेश के जड़ो से जुड़े हुए हों  |
यहाँ बहार से भी जो महानुभाव आते हैं , वे भी यहाँ की संस्कृति और उपदेश देने की परंपरा  को तहे दिल से स्वागत कर , खुल कर के खूब उपदेश , जी भरकर हमारे देश और हम  देशवासियों  को देने लगते हैं | ताज़ातरीन उदहारण आपके सामने है--अमेरिकी राष्ट्रपति  ओबामा का हमारे देश आना ,और हमें उपदेश दे के चले जाना | ये अकेले नहीं हैं, इनके जैसे कई महानुभाव  आये और चले गए | खुद हिंसा का   आन्दोलन दुनिया मे जोरो-सोरो से चलायें हैं, और हमें अहिंसा का उपदेश देने चले आते हैं | और भी कई मुद्दों पर ये हमें उपदेश देते रहते हैं | इन्हे लगता है ,  हम बच्चे  की भांति इनके उपदेश को मानेंगे और प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक के उपदेश की भांति इनके दिए गए उपदेश का सम्मान करेंगा |  पर आश्चर्य  ;प्रयोग मे हम ऐसा ही करते हैं  ! 


सामान्यतः उपदेश-- मार्ग से भटकने वालों,गलत(जुर्म,पाप) करने वालों.दबे-कुचले लोगों ,असहाय और बेबस  को दिया जाता है |   अब आपलोग बुधिमानजन हैं , आपलोग ही सोचिये एकपल के लिए  की जो महानुभाव लोग हमारे अथिति के रूप मे दुसरे देश से हमारे  देश आते हैं ------हमें वे क्या सोच-समझकर उपदेश देते हैं  |हम विकाशसील देश हैं इसलिए नहीं; बल्कि वे समझते है हम बेबश,असहाय और लाचार हैं |
इसीलिए तो मै कहता हूँ --"उपदेश देना ही हमारी समस्या है |"

1 comment:

  1. बहुत से लोग तर्क देते है की उपदेश के बहाने लोग अपने अनुभव (तजुर्बा) का इस्तेमाल कर आगाह करते हैं की जिन गलतियों को उन्होंने किया है ;सामने वाला न करे | पर वे ये भूल जातें हैं की उपदेश और सलाह देने का हक उसे ही बनता है ,जो सफल हो |असफल भला किसी को क्या सलाह दे सकता है |इस तरह वे खुद अयुग्य हो जातें हैं उपदेश देने के लिए |

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