आज जहाँ देखो वहां उपदेश देते लोग नज़र आ जायेंगे | बाप-बेटे को,पति पत्नी को, शिक्षक शिष्य को ,नेता कार्यकर्ता को, सिनिअर जूनियर को , ये बड़े गर्व से उपदेश दे रहे होते हैं, जैसे उपदेश देना इनका कर्तव्य हो | मुझे तो लगता है ज्यादातर उपदेश देनेवालों का उपदेश देने के पीछे एक खाश मकसद और स्वार्थ छीपा हुआ रहता है | इनकी मानसिकता(मकसद) होता है सामने वाले को उपदेश के बहाने निचा दिखाना और अवसाद ग्रस्त करना | ऊपर का कर्मचारी निचे के कर्मचारी को, सिनिअर जूनियर को , प्रोफ़ेसर शोध छात्र को निचा दिखाते रहते हैं , ये महानुभाव-लोग (इन्हें ) उपदेश देने के बहाने अवसादग्रस्त(frustrate ) कैसे करें यही सोचते रहते हैं | ये उपदेश देते वक़्त एक पल के लिए भी नहीं सोचते की यदि वे खुद दिए गए उपदेश पर अमल करते तो ये उपदेश देने की नौबत ही न आती | किसी अच्छे कार्य को कर के उदहारण पेश करने के बजाय ये अपनी गलतिओं को छुपाकर , उपदेश के बहाने अपनी झल्लाहट सामने वाले को अवसादग्रस्त कर के निकालते हैं | खुद तो जिंदगी मे अवसादग्रस्त रहते ही हैं , सामने वाले को भी उपदेश के बहाने अवसादग्रस्त करते हैं |
साधू-महात्मा,मौलवी साहब सब जनता को फ़ोकट मे उपदेश दे र
हे होते हैं | जनता को जरूरत भले न हो ; पर फिर भी वे उपदेश देंगे क्योंकि इससे ही तो इनका रोज़गार चलता है | यह बात तो समझ मे आती है, पर ये समझ मे नहीं आता की आज सारा देश ही उपदेश के चक्कर मे कैसे पड़ गया है | जहाँ देखो वहीँ लोग एक दुसरे को फ़ोकट मे उपदेश देते नज़र आ जाएँगे | क्या इन्हे पता नहीं होता --"उपदेश देना जितना आसान होता है; प्रयोग मे लाना उतना ही कठिन होता है | "
आज उपदेश देना हमारी संस्कृति और देश मे इस कदर समां गया है की जैसे लगता है हम उपदेश के जड़ो से जुड़े हुए हों |
यहाँ बहार से भी जो महानुभाव आते हैं , वे भी यहाँ की संस्कृति और उपदेश देने की परंपरा को तहे दिल से स्वागत कर , खुल कर के खूब उपदेश , जी भरकर हमारे देश और हम देशवासियों को देने लगते हैं | ताज़ातरीन उदहारण आपके सामने है--अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का हमारे देश आना ,और हमें उपदेश दे के चले जाना | ये अकेले नहीं हैं, इनके जैसे कई महानुभाव आये और चले गए | खुद हिंसा का आन्दोलन दुनिया मे जोरो-सोरो से चलायें हैं, और हमें अहिंसा का उपदेश देने चले आते हैं | और भी कई मुद्दों पर ये हमें उपदेश देते रहते हैं | इन्हे लगता है , हम बच्चे की भांति इनके उपदेश को मानेंगे और प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक के उपदेश की भांति इनके दिए गए उपदेश का सम्मान करेंगा | पर आश्चर्य ;प्रयोग मे हम ऐसा ही करते हैं !
सामान्यतः उपदेश-- मार्ग से भटकने वालों,गलत(जुर्म,पाप) करने वालों.दबे-कुचले लोगों ,असहाय और बेबस को दिया जाता है | अब आपलोग बुधिमानजन हैं , आपलोग ही सोचिये एकपल के लिए की जो महानुभाव लोग हमारे अथिति के रूप मे दुसरे देश से हमारे देश आते हैं ------हमें वे क्या सोच-समझकर उपदेश देते हैं |हम विकाशसील देश हैं इसलिए नहीं; बल्कि वे समझते है हम बेबश,असहाय और लाचार हैं |
इसीलिए तो मै कहता हूँ --"उपदेश देना ही हमारी समस्या है |"
साधू-महात्मा,मौलवी साहब सब जनता को फ़ोकट मे उपदेश दे र
हे होते हैं | जनता को जरूरत भले न हो ; पर फिर भी वे उपदेश देंगे क्योंकि इससे ही तो इनका रोज़गार चलता है | यह बात तो समझ मे आती है, पर ये समझ मे नहीं आता की आज सारा देश ही उपदेश के चक्कर मे कैसे पड़ गया है | जहाँ देखो वहीँ लोग एक दुसरे को फ़ोकट मे उपदेश देते नज़र आ जाएँगे | क्या इन्हे पता नहीं होता --"उपदेश देना जितना आसान होता है; प्रयोग मे लाना उतना ही कठिन होता है | "आज उपदेश देना हमारी संस्कृति और देश मे इस कदर समां गया है की जैसे लगता है हम उपदेश के जड़ो से जुड़े हुए हों |
यहाँ बहार से भी जो महानुभाव आते हैं , वे भी यहाँ की संस्कृति और उपदेश देने की परंपरा को तहे दिल से स्वागत कर , खुल कर के खूब उपदेश , जी भरकर हमारे देश और हम देशवासियों को देने लगते हैं | ताज़ातरीन उदहारण आपके सामने है--अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का हमारे देश आना ,और हमें उपदेश दे के चले जाना | ये अकेले नहीं हैं, इनके जैसे कई महानुभाव आये और चले गए | खुद हिंसा का आन्दोलन दुनिया मे जोरो-सोरो से चलायें हैं, और हमें अहिंसा का उपदेश देने चले आते हैं | और भी कई मुद्दों पर ये हमें उपदेश देते रहते हैं | इन्हे लगता है , हम बच्चे की भांति इनके उपदेश को मानेंगे और प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक के उपदेश की भांति इनके दिए गए उपदेश का सम्मान करेंगा | पर आश्चर्य ;प्रयोग मे हम ऐसा ही करते हैं !
इसीलिए तो मै कहता हूँ --"उपदेश देना ही हमारी समस्या है |"




बहुत से लोग तर्क देते है की उपदेश के बहाने लोग अपने अनुभव (तजुर्बा) का इस्तेमाल कर आगाह करते हैं की जिन गलतियों को उन्होंने किया है ;सामने वाला न करे | पर वे ये भूल जातें हैं की उपदेश और सलाह देने का हक उसे ही बनता है ,जो सफल हो |असफल भला किसी को क्या सलाह दे सकता है |इस तरह वे खुद अयुग्य हो जातें हैं उपदेश देने के लिए |
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