ज्वलंत मुद्दे जो हमसे जुड़े हैं| जिनका हमारे समाज पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है और उनमे सुधार होना ही चाहिए |
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Tuesday, January 11, 2011
मुद्दे जो हमसे जुड़े है: उपदेश के बहाने
मुद्दे जो हमसे जुड़े है: उपदेश के बहाने: "आज जहाँ देखो वहां उपदेश देते लोग नज़र आ जायेंगे |बाप-बेटे को,पति पत्नी को, शिक्षक शिष्य को ,नेता कार्यकर्ता को,सिनिअर जूनियर को ,ये बड..."
उपदेश के बहाने
आज जहाँ देखो वहां उपदेश देते लोग नज़र आ जायेंगे | बाप-बेटे को,पति पत्नी को, शिक्षक शिष्य को ,नेता कार्यकर्ता को, सिनिअर जूनियर को , ये बड़े गर्व से उपदेश दे रहे होते हैं, जैसे उपदेश देना इनका कर्तव्य हो | मुझे तो लगता है ज्यादातर उपदेश देनेवालों का उपदेश देने के पीछे एक खाश मकसद और स्वार्थ छीपा हुआ रहता है | इनकी मानसिकता(मकसद) होता है सामने वाले को उपदेश के बहाने निचा दिखाना और अवसाद ग्रस्त करना | ऊपर का कर्मचारी निचे के कर्मचारी को, सिनिअर जूनियर को , प्रोफ़ेसर शोध छात्र को निचा दिखाते रहते हैं , ये महानुभाव-लोग (इन्हें ) उपदेश देने के बहाने अवसादग्रस्त(frustrate ) कैसे करें यही सोचते रहते हैं | ये उपदेश देते वक़्त एक पल के लिए भी नहीं सोचते की यदि वे खुद दिए गए उपदेश पर अमल करते तो ये उपदेश देने की नौबत ही न आती | किसी अच्छे कार्य को कर के उदहारण पेश करने के बजाय ये अपनी गलतिओं को छुपाकर , उपदेश के बहाने अपनी झल्लाहट सामने वाले को अवसादग्रस्त कर के निकालते हैं | खुद तो जिंदगी मे अवसादग्रस्त रहते ही हैं , सामने वाले को भी उपदेश के बहाने अवसादग्रस्त करते हैं |
साधू-महात्मा,मौलवी साहब सब जनता को फ़ोकट मे उपदेश दे र
हे होते हैं | जनता को जरूरत भले न हो ; पर फिर भी वे उपदेश देंगे क्योंकि इससे ही तो इनका रोज़गार चलता है | यह बात तो समझ मे आती है, पर ये समझ मे नहीं आता की आज सारा देश ही उपदेश के चक्कर मे कैसे पड़ गया है | जहाँ देखो वहीँ लोग एक दुसरे को फ़ोकट मे उपदेश देते नज़र आ जाएँगे | क्या इन्हे पता नहीं होता --"उपदेश देना जितना आसान होता है; प्रयोग मे लाना उतना ही कठिन होता है | "
आज उपदेश देना हमारी संस्कृति और देश मे इस कदर समां गया है की जैसे लगता है हम उपदेश के जड़ो से जुड़े हुए हों |
यहाँ बहार से भी जो महानुभाव आते हैं , वे भी यहाँ की संस्कृति और उपदेश देने की परंपरा को तहे दिल से स्वागत कर , खुल कर के खूब उपदेश , जी भरकर हमारे देश और हम देशवासियों को देने लगते हैं | ताज़ातरीन उदहारण आपके सामने है--अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का हमारे देश आना ,और हमें उपदेश दे के चले जाना | ये अकेले नहीं हैं, इनके जैसे कई महानुभाव आये और चले गए | खुद हिंसा का आन्दोलन दुनिया मे जोरो-सोरो से चलायें हैं, और हमें अहिंसा का उपदेश देने चले आते हैं | और भी कई मुद्दों पर ये हमें उपदेश देते रहते हैं | इन्हे लगता है , हम बच्चे की भांति इनके उपदेश को मानेंगे और प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक के उपदेश की भांति इनके दिए गए उपदेश का सम्मान करेंगा | पर आश्चर्य ;प्रयोग मे हम ऐसा ही करते हैं !
सामान्यतः उपदेश-- मार्ग से भटकने वालों,गलत(जुर्म,पाप) करने वालों.दबे-कुचले लोगों ,असहाय और बेबस को दिया जाता है | अब आपलोग बुधिमानजन हैं , आपलोग ही सोचिये एकपल के लिए की जो महानुभाव लोग हमारे अथिति के रूप मे दुसरे देश से हमारे देश आते हैं ------हमें वे क्या सोच-समझकर उपदेश देते हैं |हम विकाशसील देश हैं इसलिए नहीं; बल्कि वे समझते है हम बेबश,असहाय और लाचार हैं |
इसीलिए तो मै कहता हूँ --"उपदेश देना ही हमारी समस्या है |"
साधू-महात्मा,मौलवी साहब सब जनता को फ़ोकट मे उपदेश दे र
हे होते हैं | जनता को जरूरत भले न हो ; पर फिर भी वे उपदेश देंगे क्योंकि इससे ही तो इनका रोज़गार चलता है | यह बात तो समझ मे आती है, पर ये समझ मे नहीं आता की आज सारा देश ही उपदेश के चक्कर मे कैसे पड़ गया है | जहाँ देखो वहीँ लोग एक दुसरे को फ़ोकट मे उपदेश देते नज़र आ जाएँगे | क्या इन्हे पता नहीं होता --"उपदेश देना जितना आसान होता है; प्रयोग मे लाना उतना ही कठिन होता है | "आज उपदेश देना हमारी संस्कृति और देश मे इस कदर समां गया है की जैसे लगता है हम उपदेश के जड़ो से जुड़े हुए हों |
यहाँ बहार से भी जो महानुभाव आते हैं , वे भी यहाँ की संस्कृति और उपदेश देने की परंपरा को तहे दिल से स्वागत कर , खुल कर के खूब उपदेश , जी भरकर हमारे देश और हम देशवासियों को देने लगते हैं | ताज़ातरीन उदहारण आपके सामने है--अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का हमारे देश आना ,और हमें उपदेश दे के चले जाना | ये अकेले नहीं हैं, इनके जैसे कई महानुभाव आये और चले गए | खुद हिंसा का आन्दोलन दुनिया मे जोरो-सोरो से चलायें हैं, और हमें अहिंसा का उपदेश देने चले आते हैं | और भी कई मुद्दों पर ये हमें उपदेश देते रहते हैं | इन्हे लगता है , हम बच्चे की भांति इनके उपदेश को मानेंगे और प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक के उपदेश की भांति इनके दिए गए उपदेश का सम्मान करेंगा | पर आश्चर्य ;प्रयोग मे हम ऐसा ही करते हैं !
इसीलिए तो मै कहता हूँ --"उपदेश देना ही हमारी समस्या है |"
Saturday, January 8, 2011
मुझे ईमानदार नहीं बनना...............
मै यूँ ही सोचने लगा ................,मेरे दो दोस्त आपस मे बात-चित कर रहे थे -"हम तभी तक इमानदार है ;जबतक हमें मौका नहीं मिलता |"सन्देश साफ़ था ,मौका मिले तो ये ९५% जो ईमानदार है ,वे भी बेईमानी करने से बाज नहीं आएंगे |हम तो ईमानदारी का सिर्फ दिखावा करते है| क्योंकि हमें बेईमानी का सुअवसर ही नहीं प्राप्त हुआ |
मुझे ईमानदार नहीं बनना ...२ तभी मेरे एक दोस्त ने पूरी पंक्ति यह कहकर पूरी कर दी "....क्योंकि मुझे फोटो नहीं बनना |"---इशारा साफ़ था ज्यादा ईमानदार बनने का प्रयास किये नहीं की ऊपर चले गए |हाँ तो मै कह रहा था की आखिर मै ये क्यों गुनगुना रहा था मुझे ईमानदार नहीं बनान .....मुझे ईमानदार नहीं बनना , क्योंकि एक तस्वीर मेरे आँखों से होकर दिमाग के तंतुओ मे उभर रही थी | मान लीजिये एक ईमानदार और कर्त्वनिस्ठ जिलाधिकारी एक नए शहर मे आया |तुरंत वहां के दलाल और माफिया उसके इर्द-गिर्द मंडराते नज़र आ जाते है | अब यदि उस शहर का नामी-गिरामी शख्स जो पेशे से बिल्डर है रियल स्टेट का (वास्तव मे भू-माफिया है) आये और बोले -" सर ये पेसे के तौर पर ये३५ लाख सूटकेस मे रखा है रख लीजिये और इस फाइल मे हस्ताक्षर कर दीजिए |अब आप बताइए ऐसे स्थिति मे वह सरकारी कर्मचारी क्या करे ! उसके पास केवल दो विकल्प बचते है|पहला वह अवैध और गैरकानूनी ढंग से बनायीं जा रही प्रोजेक्ट को पास कर दे और आराम से पैसा रख ले| और दूसरा वह अपनी ईमानदारी का परिचय देते हुए प्रोजेक्ट को पास करने से इंकार कर दे |इसका परिणाम उसको पता है-अगले दिन वह गोली का शिकार हो जायेगा और फोटो बन जायेगा |इस विकल्प मे उसे पैसा (घूश) भी नहीं मिलता और गैरकानूनी तरीके से मृत्यु भी प्राप्त हो जाती है |
अब आप ही बताइए वास्तव मे लोग इन दो विकल्पों मे से क्या चुनना पसंद करते है | आसान है अंदाज़ा लगाना ;पर जानते है इससे भी आसान है,ये बोल देनाकी पूरा तंत्र (system) मे ही दोष है ,जो एक ईमानदार को भी आखिर मे बेईमान बना देता है |
दूसरा उदहारण है यदि किसी तंत्र मे निचला अधिकारी अपने से ऊँचे के कुर्सी के पदाधिकारी को चढ़ावा नहीं चढ़ाता क्योंकि वह ईमानदार है तो उसके साथ क्या होता है; पता है उसको कही सुदूर जंगल-पहाड़ मे तबादला कर दिया जाता है |येहा ऊपर के अधिकारी की मानसिकता साफ़ झलकती है -"वह सोचता है की निचला अधिकारी सारा का सारा माल अकेले हड़प लेना चाहता है "|अंततोगत्वा वह इमानदार कर्मचारी भी अवसादग्रस्त होकर घुस लेना आरम्भ कर देता है | ये घटनाएँ पुलिस ,बैंक और विकाश प्राधिकरण मे आसानी से देखने को मिल जाएँगी |
हम यानी आम जनता भी कम दोषी नहीं है |हम जल्दबाजी के चक्कर मे घूश देना पसंद करते हैं| और घुस के लिए तंत्र पर प्रत्यारोपण कर अपने जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ लेते हैं |जबकि हमको पता है १९६५ मे जो भ्रस्टाचार -निरोधी कानून बना था | उसमे साफ़-साफ दर्ज है"घूसलेना और देना दोनों अपराध है "|
आप सोच रहे होंगे की तब हम तंत्र को कैसे ठीक कर सकते हैं |मेरा तो भाई एक फंडा है ---"यदि तुम्हारे घर मे बरसात का पानी आने लगे तो तुम उस समय क्या करोगे;अब बादल या उस माकन को बनाने वाले मजदूर-मिस्त्रियों को तो कोसना शुरू नहीं कर दोगे | यदि ऐसा करते हो तो तुम घर मे ही डूब जाओगे और परेशानी खुद झेलोगे | यदि तुम उस परेशानी से बचना चाहते होगे तो तुम उस सुराख़ को बंद करने का प्रयास करोगे जहाँ से बरसात का पानी आ रहा होगा और जिससे घर मे पानी आना बंद हो जाये " | ठीक इसी तरह यदि हमारे तंत्र ,समाज,संस्कृति धर्म मे यदि कोई कमी(सुराख़) है तो हमें उसे बंद करके,मरम्मत करके ठीक करना हमारा फ़र्ज़ बनता है |
उफ्फ-हो ये मै क्या करने लगा ,ये तो मै उपदेश देने लगा जबकि जानता हूँ |उपदेश देना कितना आसन है और प्रयोग मे लाना कितना कठिन |भारत मे उपदेश देने वालों की कमी नहीं है सो मुझे उपदेश देने मे बेरोजगार रहना ही पसंद है |
तो मै बोल रहा था अब इसका हल समाज के पास क्या है |मेरा तो अपने जीवन का एक फंडा है --"मुझे ईमानदार नहीं बनना; लेकिन बेईमानो मे से कुछ ईमानदार बनना है |"मतलब साफ़ है यदि आपको सच मे ईमानदारी से कार्य करना है तो एक काम काम करना होगा |अब मै वही दो विकल्पों पर गौर करता हूँ ---एक तरफ पैसा,जिंदगी और आराम है और दूसरी तरफ ईमानदारी के साथ मौत |तो मै येहाँ क्या तीसरे विकल्प की कल्पना कर सकता हूँ!इस विकल्प मे पैसा भी मिल जायेगा ,उसे पैसे से उस माफिया को साफ़ करने का रास्ता भी मिल जायेगा और कुछ गरीबों मे बांटकर धर्म और ईमानदारी का कार्य भी हो जायेगा |
इस कार्य के करने के दो वजह --१.अपनी जिंदगी सही सलामत रही तभी तो कोई भी ईमानदारी का काम करने लायक रह पाएंगे |२. "आत्मेन रक्ष्यते परमोधर्मः || " तो पैसा लेकर अपनी जिंदगी बचाओ |३.उस माफिया को ख़त्म करके एक कर्तव्य भी पूरा करो |(शाठ्यम सदा दुर्जनः|| )|और पैसा गरीबों मे बांटकर एक नेकी और धर्म का कार्य भी कर दो |
इसीलिए तो मै कहता हूँ --हमें ईमानदार नहीं(बनना ) चाहियें -------------------------------------------------बल्कि बेईमानों मे से थोरा ईमानदार चाहियें ||
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| अधिकारी और दबंग शख्स |
अब आप ही बताइए वास्तव मे लोग इन दो विकल्पों मे से क्या चुनना पसंद करते है | आसान है अंदाज़ा लगाना ;पर जानते है इससे भी आसान है,ये बोल देनाकी पूरा तंत्र (system) मे ही दोष है ,जो एक ईमानदार को भी आखिर मे बेईमान बना देता है |
दूसरा उदहारण है यदि किसी तंत्र मे निचला अधिकारी अपने से ऊँचे के कुर्सी के पदाधिकारी को चढ़ावा नहीं चढ़ाता क्योंकि वह ईमानदार है तो उसके साथ क्या होता है; पता है उसको कही सुदूर जंगल-पहाड़ मे तबादला कर दिया जाता है |येहा ऊपर के अधिकारी की मानसिकता साफ़ झलकती है -"वह सोचता है की निचला अधिकारी सारा का सारा माल अकेले हड़प लेना चाहता है "|अंततोगत्वा वह इमानदार कर्मचारी भी अवसादग्रस्त होकर घुस लेना आरम्भ कर देता है | ये घटनाएँ पुलिस ,बैंक और विकाश प्राधिकरण मे आसानी से देखने को मिल जाएँगी |
हम यानी आम जनता भी कम दोषी नहीं है |हम जल्दबाजी के चक्कर मे घूश देना पसंद करते हैं| और घुस के लिए तंत्र पर प्रत्यारोपण कर अपने जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ लेते हैं |जबकि हमको पता है १९६५ मे जो भ्रस्टाचार -निरोधी कानून बना था | उसमे साफ़-साफ दर्ज है"घूसलेना और देना दोनों अपराध है "|
आप सोच रहे होंगे की तब हम तंत्र को कैसे ठीक कर सकते हैं |मेरा तो भाई एक फंडा है ---"यदि तुम्हारे घर मे बरसात का पानी आने लगे तो तुम उस समय क्या करोगे;अब बादल या उस माकन को बनाने वाले मजदूर-मिस्त्रियों को तो कोसना शुरू नहीं कर दोगे | यदि ऐसा करते हो तो तुम घर मे ही डूब जाओगे और परेशानी खुद झेलोगे | यदि तुम उस परेशानी से बचना चाहते होगे तो तुम उस सुराख़ को बंद करने का प्रयास करोगे जहाँ से बरसात का पानी आ रहा होगा और जिससे घर मे पानी आना बंद हो जाये " | ठीक इसी तरह यदि हमारे तंत्र ,समाज,संस्कृति धर्म मे यदि कोई कमी(सुराख़) है तो हमें उसे बंद करके,मरम्मत करके ठीक करना हमारा फ़र्ज़ बनता है |
उफ्फ-हो ये मै क्या करने लगा ,ये तो मै उपदेश देने लगा जबकि जानता हूँ |उपदेश देना कितना आसन है और प्रयोग मे लाना कितना कठिन |भारत मे उपदेश देने वालों की कमी नहीं है सो मुझे उपदेश देने मे बेरोजगार रहना ही पसंद है |
तो मै बोल रहा था अब इसका हल समाज के पास क्या है |मेरा तो अपने जीवन का एक फंडा है --"मुझे ईमानदार नहीं बनना; लेकिन बेईमानो मे से कुछ ईमानदार बनना है |"मतलब साफ़ है यदि आपको सच मे ईमानदारी से कार्य करना है तो एक काम काम करना होगा |अब मै वही दो विकल्पों पर गौर करता हूँ ---एक तरफ पैसा,जिंदगी और आराम है और दूसरी तरफ ईमानदारी के साथ मौत |तो मै येहाँ क्या तीसरे विकल्प की कल्पना कर सकता हूँ!इस विकल्प मे पैसा भी मिल जायेगा ,उसे पैसे से उस माफिया को साफ़ करने का रास्ता भी मिल जायेगा और कुछ गरीबों मे बांटकर धर्म और ईमानदारी का कार्य भी हो जायेगा |
इस कार्य के करने के दो वजह --१.अपनी जिंदगी सही सलामत रही तभी तो कोई भी ईमानदारी का काम करने लायक रह पाएंगे |२. "आत्मेन रक्ष्यते परमोधर्मः || " तो पैसा लेकर अपनी जिंदगी बचाओ |३.उस माफिया को ख़त्म करके एक कर्तव्य भी पूरा करो |(शाठ्यम सदा दुर्जनः|| )|और पैसा गरीबों मे बांटकर एक नेकी और धर्म का कार्य भी कर दो |
इसीलिए तो मै कहता हूँ --हमें ईमानदार नहीं
Friday, December 31, 2010
मेरी कलम से ..............
मुझे समझ मे नहीं आ रहा है की मै कहा से शुरु करूँ ; पर शुरुआत तो करनी ही होगी मुझे | दो सालों तक हिंदी न लिखने की वजह से मेरी हिंदी-वर्तनी सम्बन्धी गलतियाँ तो होंगी ही पर भावनाएं और सोच मे तो कोई परिवर्तन नहीं हो सकता |
मै सोचता हूँ आज की जिंदगी कैसे हो गयी है , लोग अपने आप मे ही सिमटे जा रहे हैं;उन्हें किसी की परवाह नहीं ;भगवान् सोचने और विचार करने की शक्ति सिर्फ इंसान को ही दिए है, ऐसा क्यों ;पर हम उसका इस्तेमाल ही न करें तो कैसा लगेगा .......
जैसा आज मेरा मन अचानक बेचैन हो उठा जब मैंने अपने देश के वर्तमान और अतीत का झांकना शुरू किया | मै एकाएक से स्तब्ध रह गया की लोग अपने आप मे कितना खो गए है की उन्हें अपने आप की भी सुध नहीं रह गयी है |अब मैंने सोचना शुरू किया की हम बात कितनी बड़ी-बड़ी करते है , हमें अपने आप पर फक्र होता है सोचकर की हम ऐसे देश के नागरिक है वैसे अतीत वाले देश के नागरिक हैं| पर क्या हमने कभी सोचा है देश मे आज क्या हो रहा है ???????
आज अपने ही देश मे लोग अपने घर से जबरन बेघर कर दिए जाते हैं ,और अपने ही देश मे भगोड़े (refugee) की जिंदगी जी रहे है -- और कहते है हम सबसे बड़े लोकतंत्र मे जी रहे है | उदहारण सामने है ----कश्मीरी हिन्दू |इन सबका हस्र !!वे बेचारे अपने ही घर से बेघर कर दिए गए जहाँ वे हजारों सालों से रहते आ रहे थे |हमारी सरकार तब क्या कर रही थी |उस समय मानवाधिकार क्या कर रहा था |
आखिर इस देश मे हो क्या रहा है |जिन बातों को एक छोटा बच्चा भी बिना तर्क दिए समझ सकता है ,उन बातों के लिए हमारे बुज़ुर्ग और जिम्मेवार लोग हमारे देश की सर्योच्य पंचायत संसद-भवन मे महीनो तक बहस करते है | {इनकी हरकते देख के तो लगता है जैसे इनका बचपना वापस आ गया है |बुज़र्गो को भी संसद मे मार-पिट और झगडा करते देख लगता है जैसे ये सठियाँ गए हों,वो बोलते नहीं है "बूढ़े और बचों की मानसिकता बाद मे एक जैसे हो जाती है" |मेरी एक बात समझ मे नहीं आती है अवकाशप्राप्त की उम्र मे जबकि सभी विभागों मे काम करना मना होता है तब ये देश की सर्वोच्य जगहों पर ये महानुभाव क्या कर रहे होते है (जहाँ देश के भविष्य के बारे मे फैसला लेना कोई बचों का खेल नहीं होता है) ??}अदालत कमीशन पर कमीशन बैठाता है और हमलोग चटकारे ले-ले कर इन्ही सब बातों को लेकर न्यूज़ पढ़ा और देखा करते हैं |
स्लम पर एक फिल्म बन जाती है ;जो भारत की सिर्फ गरीबी और बेबशी दिखाती है तो उसे नोबेल अवार्ड मिल जाता है(वाटर मूवी फी पहुँच ही चुकी थी फ़ाइनल मे ) |अरुंधती रॉय अपने निजी जीवन के कुछ अश्लील प्रसंगों का विवरण अपने नोवेल मे कर देती है तो उन्हें मैग्ससे अवार्ड मिल जाता है |ये अवार्ड देने वालों को हमारा ताजमहल नहीं दीखता क्या ?क्या उन्हें सिर्फ हमारा स्लम दीखता है ?की उनकी मानसिकता ही कुछ ऐसे है की उन्हें सिर्फ हमारी बुराइया ही पसंद है |उन्हें सिर्फ हमारी अश्लीलता और जंगलीपन दीखता है हमारे जीवन जीने के सिधांत और वेद ग्रन्थ नहीं दीखते हैं|
एक बात सबको पता है की जो इतिहास और अपना अतीत हम जिन किताबों मे पढ़ते है ,वह सब गलत है |इसके बावजूद भी हम 70 सालों से उन्हें पढ़े ही जा रहे है |क्या हम आज भी विवश है या गुलाम है या जो 500 सालों तक हम जो गुलाम थे उसका प्रभाव है |सब जानते है जिन अंग्रेजों ने हमारा इतिहाश लिखा ,वही हम आज भी पढ़ रहे है |जबकि इन अंग्रेजों की मानसिकता क्या थी हमारे प्रति सबको पता है|{ जो आजतक नहीं बदली है यदा-कदा आस्कर और मग्सेसे अवार्ड देने के क्रम मे दिख ही जाती है |}---हमें वे जंगली और हमारी सभ्यता संस्कृति को असभ्य समझते थे |इस मानसिकता के होने के बवजूद क्या कही से लगता है की जब सिन्धु-हड़प्पा संस्कृति की खुदाई हुई होगी और इन अवशेसों से हमारी ऊँच सभ्यता - संस्कृति की झलक जब झलक इन्हे दिखाई दी होगी ,तब क्या इसे वे लोग कुबूल कर सकते थे ?नहीं कभी नहीं और उन्होंने अपने अनुशार हमारे इतिहाश को लिखा |वे कभी नहीं कुबूल कर सकते थे की हमारी सभ्यता -संस्कृति इतनी ऊँच और हमारा जीवन -स्तर इतना महान हो सकता है |{उनकी तो इसाइयत ही खतरे मे पड़ जाती न| }उसके बाद हमारे साहित्यों और इतिहाश पर वामपंथी (communist-lobby) हावी हो गयी|इन्होने तो हद ही कर दी --- वे लोग बोलने लगे की हम आर्य ही विदेशी है बाहर से आये है, इरान से आये है, अरब से आये हैं ,मध्य एशिया से है {इनके लिए तो एक ही उदहारण काफी है मेरा आपने देखा होगा हमरे संस्कृति मे किसी भी शुभ काम मे नारियल फोड़ी जाती है --कहीं भी पुरे भारत मे कश्मीर से तमिलनाडु तक और पाकिस्तान से वर्मा तक ,,जब हम रेगिस्तान के है तो हमारे धर्म-ग्रंथों मे नारियल kahan से आ गया जी ,ये तो समुद्र के किनारे होता है,ये विचार मेरे दिमाग मे बस से ecr पर चलते हुए आया |}जैसे लगता है ये लोग ब्रिटेन की औलाद हों |येह धर्मनिरपेक्षता(secularism का definition ही दुनिया से हट के है येहाँ ) का मतलब सिर्फ बहुसंख्यक(majority of people) हिन्दुओं को तंग करना और इनकी संस्कृति का अपमान करना होता है | धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियाँ (secularism based parties of india )तो एक हाथ आगे ही हमेसा रहती है यहाँ इन सब बातों के मामले मे |भारत ही एक अपवाद(exception) है इन सब घटनाओ के मामले मे;पूरी दुनिया मे जिसकी संख्या ज्यादी होती है उसीका सिक्का जमता है (लोकतंत्र का मतलब ही होता है रुखी सुखी भाषा मे अधिक मत वालों की सरकार )|पर यहाँ तो गंगा कुछ उलटी ही बहती है |हम ही इन सबके जिम्मेवार है क्योंकि हमसे ही तो सरकार है |बहुत हो गया सहनशीलता का दिखावा और पाखंड |हम और ज्यादा सहन नहीं कर सकते |हमें अपने अतीत को याद करना होगा |हम जब तक परमाणु संपन्न नहीं हुए हमें संयुक्त-रास्त्रासंघ मे सम्मानजनक स्थान नहीं मिला | यह एक सबक है "शांत रहो पर अशांत करने वालों को शबक सिखाने के लिए हमेशा तैयार रहो ,हमेशा अपनी सुरक्षा के लिया तत्पर रहो |"
हमें सतयुग नहीं चाहिए और न ही रामयुग चाहिए |हम तो बस चाहते है इसे युग मे इसी लोकतंत्र मे शांति से रहते हुए अपने आपको विकाश्नोमुखी बनाये |हमें चन्द्रगुप्त मोर्य के शासनकाल से प्रेरणा लेनी होगी |जिसका शासन गांधार
(आफ्गानिस्तान )से कामरूप(असोम) तक था |विस्वविजेता सिकंदर को भी जिससे संधि करनी पड़ी |
आखिर हमें हो क्या गया है ,आखिर हम नपुंसक की तरह क्यों बैठे हैं? -......आप कह सकते हैं एक आदमी के कहने और करने से क्या होने वाला है --तो मै पूछता हूँ ;यदि सभी लोग इसी तरह और ऐसा ही सोचने लगे तो सच मे इस देश का कुछ नहीं हो सकता |..........SRT
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| my thought desk |
Wednesday, December 29, 2010
हमें अपनी मानसिकता बदलनी ही होगी
ये एक आदत सी हो गयी है हमें किसी भी बात के लिए दुसरे को दोषी ठहराना | किसी भी बात पर हम बोलते है जो हो रहा है होने दो |जबकि उनको अछि तरह से मालूम होता है की जो भ्रस्टाचार हो रहा है --वह किसी न किसी तरह से उन्हें दुष्प्रभावित करेगा ही |
हमेशा हम बोलते है : मै क्या कर सकता हूँ ,,मै क्या कर सकता हूँ | मै पूछता हूँ ये मै, मै मिलकर ही तो "हम" बनता है ; इसी तरह ही बोलते रहे तो एक दिन सच मे ही हम कुछ करने लायक नहीं रह पाएंगे | और इस तरह देश को दुर्गति की और ले जाने के लिए हम ही जिम्मेवार होंगे|
हमेशा हम बोलते है : मै क्या कर सकता हूँ ,,मै क्या कर सकता हूँ | मै पूछता हूँ ये मै, मै मिलकर ही तो "हम" बनता है ; इसी तरह ही बोलते रहे तो एक दिन सच मे ही हम कुछ करने लायक नहीं रह पाएंगे | और इस तरह देश को दुर्गति की और ले जाने के लिए हम ही जिम्मेवार होंगे|
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